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रथयात्रा: जगन्नाथ पुरी का प्रमुख उत्सव

जगन्नाथ मंदिर, ओडिशा की प्राचीन धार्मिक स्थल है, जो चार धामों में से एक माना जाता है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा होती है। रथ यात्रा इस मंदिर की प्रमुख विशेषता है, जिसमें देवताओं को रथ पर बैठाकर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है। यह स्थान भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र है।

जब भी कहि धार्मिक स्थान पर घूमने की याद आये तो पूरी का जगन्नाथ मंदिर याद जरूर आता है हा वही मंदिर जो चार धामों में से एक है में पर्सनली तोर पर एक बार भगवान जगन्नाथ मंदिर गया हु वह जाने का अनुभव कुछ अलग ही था। पग पग पर मनो ऐसा महसूस होगा की भगवान जगन्नाथ हमारे साथ हो। वृन्दावन वासी कृष्ण भक्त भगवान कृष्ण को तो विष्णु भक्त विष्णु भगवान को और गुजरात वासी द्वारिकाधीश को वहा पाते है। यु कहे तो वहा (जगन्नाथ मंदिर) में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और कृष्ण भगवन के बड़े भइया बलदाऊ जी दर्शन करना बड़े भाग्य की बात तो है ही साथ ही भगवान का महाप्रसाद निचे जमीन पर बैठकर पाना उससे भी बड़े भाग्य की बात है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास

जगन्नाथ पुरी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन हिंदू मंदिरों में से एक है। यह ओडिशा राज्य के पुरी नगर में स्थित है और इसकी पूरी के रेलवे स्टेशन से दुरी 9m (2.8 km) और हिंदू धर्म के चार धामों जिन्हे चारधाम कहते है में से एक माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की मनुष्य देह मिली है तो इसमें कम से कम एक बार तो इन चार धामों की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा को समर्पित है। यह की रथयात्रा विश्वप्रिसिद्ध है।

आज का मंगलकारी दिन वही दिन है जिस दिन भगवान आज का दिन (16 जुलाई 2026) भगवान जगन्नाथ जी और उनके लाखों भक्तों के लिए अत्यंत पावन और विशेष है, क्योंकि आज के दिन ही विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा (Rath Yatra) का भव्य आरंभ होता है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यह महा-उत्सव मनाया जाता है। आज का दिन मुख्य रूप से इन कारणों से प्रसिद्ध है:

पूरे साल भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी पुरी के मुख्य मंदिर के गर्भगृह में विराजमान रहते हैं। लेकिन आज वही विशेष दिन है जब वे तीनों भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर से बाहर आते हैं और अपने विशाल एवं भव्य रथों पर सवार होते हैं।

मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर की यात्रा

रथ यात्रा के इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा जी अपने रथों पर बैठकर अपनी मौसी के घर यानी ‘गुंडिचा मंदिर’ के लिए प्रस्थान करते हैं। यह माना जाता है कि भगवान यहाँ अगले कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं और उनकी खूब सेवा-सत्कार की जाती है।

भगवान जगन्नाथ को ब्रह्मांड का नाथ (Lord of the Universe) कहा जाता है। आज का दिन इसलिए भी सबसे ज्यादा खास है क्योंकि जो लोग किसी भी कारणवश (बीमारी, जाति, या धर्म की पाबंदियों के चलते) साल भर मंदिर के अंदर जाकर दर्शन नहीं कर पाते, भगवान खुद रथ पर सवार होकर सड़क पर आते हैं ताकि हर एक व्यक्ति उनका आशीर्वाद ले सके।

इस यात्रा के तीनों रथों का निर्माण हर साल लकड़ियों से नया किया जाता है औरविशेष बात यह है की इनमें किसी भी प्रकार की कील या कांटे का उपयोग नहीं होता। आज के दिन भक्त इन विशाल रथों को अपने हाथों से खींचते हैं:

नंदीघोष जो की भगवान जगन्नाथ जी का रथ (पीले और लाल रंग का)

तालध्वज जो की बड़े भाई बलभद्र जी का रथ (हरे और लाल रंग का)

दर्पदलन जो की बहन सुभद्रा जी का रथ (काले और लाल रंग का)

पौराणिक कथा: राजा इंद्रद्युम्न

स्कंद पुराण के अनुसार, मंदिर का मूल इतिहास सत्य युग से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि मालवा (अवंती) के राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर की सबसे पहले स्थापना की थी। ऐसी मान्यता है।

कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने देव शिल्पी विश्वकर्मा को एक वृद्ध बढ़ई के रूप में मूर्तियों का निर्माण करने भेजा था। विश्वकर्मा जी की शर्त थी कि जब तक मूर्तियां पूरी नहीं हो जातीं, कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। लेकिन राजा इंद्रद्युम्न से रहा नहीं गया और उन्होंने दरवाजा खोल दिया। इस वजह से विश्वकर्मा जी मूर्तियों को अधूरा छोड़कर ही चले गए, और यही कारण है कि आज भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों के हाथ और पैर पूरी तरह से नहीं बने हैं।

मंदिर बहुत विशाल है

जगन्नाथ मंदिर परिसर लगभग 4 लाख वर्ग फीट में फैला हुआ है और यह मेघनाद पचेरी (Meghanada Pacheri) नामक 20 फीट ऊंची दीवार से घिरा हुआ है।

  • शिखर और नीलाचक्र: मुख्य मंदिर (विमान) की ऊंचाई 214 फीट (लगभग 65 मीटर) है, जो ओडिशा के सभी मंदिरों में सबसे ऊंचा है। इसके शिखर पर अष्टधातु से बना ‘नीलाचक्र’ स्थापित है, जिसे बहुत पवित्र माना जाता है।
  • संरचना: मंदिर को मुख्य रूप से चार हिस्सों में बांटा गया है— देउला (गर्भगृह), मुखशाला (सामने का बरामदा), नट मंडप (नृत्य कक्ष), और भोग मंडप (प्रसाद कक्ष)।

मंदिर का ऐतिहासिक विकास

जगन्नाथ मंदिर का उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों, विशेषकर स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान नीलमाधव की खोज के बाद भगवान जगन्नाथ की आराधना प्रारंभ कराई। हालांकि वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण ऐतिहासिक रूप से 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के शक्तिशाली शासक राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा प्रारंभ कराया गया माना जाता है। बाद में उनके उत्तराधिकारियों, विशेष रूप से अनंगभीम देव, ने मंदिर का निर्माण पूर्ण कराया और इसका विस्तार किया।

स्थापत्य कला

जगन्नाथ पुरी मंदिर कलिंग शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। लगभग 65 मीटर (214 फुट) ऊँचा इसका मुख्य शिखर दूर से ही दिखाई देता है। मंदिर परिसर दो विशाल प्राचीरों से घिरा हुआ है और इसमें अनेक छोटे-बड़े मंदिर, मंडप तथा धार्मिक संरचनाएँ स्थित हैं। मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं से संबंधित सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है।

भगवान जगन्नाथ की अनूठी प्रतिमाएँ

इस मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएँ पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि पवित्र नीम की लकड़ी से निर्मित होती हैं। निश्चित अंतराल पर आयोजित होने वाले “नवकलेवर” उत्सव में इन प्रतिमाओं का धार्मिक विधि-विधान के अनुसार पुनर्निर्माण किया जाता है, जो भारतीय धार्मिक परंपराओं की एक अद्वितीय परंपरा है।

मंदिर की अद्वितीय परंपराएं

विशेषताविवरण
लकड़ी की मूर्तियांयह देश का एकमात्र ऐसा विशाल मंदिर है जहाँ देवताओं की मूर्तियां पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि पवित्र ‘नीम’ की लकड़ी से बनी हैं।
नव कलेवर (Nabakalebara)हर 12 से 19 वर्षों में एक विशेष खगोलीय योग बनने पर मूर्तियों को बदला जाता है, जिसे नव कलेवर कहते हैं।
रथ यात्राआषाढ़ माह में होने वाली विश्व प्रसिद्ध ‘रथ यात्रा’ में तीनों देवताओं को विशाल लकड़ी के रथों में बिठाकर गुंडीचा मंदिर तक ले जाया जाता है।
महाप्रसादमंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोइयों में से एक मानी जाती है, जहाँ मिट्टी के बर्तनों में महाप्रसाद तैयार किया जाता है।

रथयात्रा का महत्व

जगन्नाथ पुरी की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा भारत के सबसे बड़े धार्मिक उत्सवों में से एक है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा विशाल सुसज्जित रथों में श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। इस उत्सव में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं और रथ खींचना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

सदियों से कई आक्रमणकारियों (जैसे 1568 में कालापहाड़) ने इस मंदिर पर हमले किए, लेकिन पुजारियों और भक्तों ने अपनी जान पर खेलकर भगवान की ‘ब्रह्म पदार्थ’ (पवित्र आत्मा) और मूर्तियों की रक्षा की। आज भी यह मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था और भक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

जगन्नाथ पुरी मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, भक्ति और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। मंदिर का महाप्रसाद सभी श्रद्धालुओं को समान रूप से वितरित किया जाता है, जो समानता और सामूहिकता का संदेश देता है। यह मंदिर ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है और भारतीय धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखता है।

अब मैं आपको जगन्नाथ मंदिर पुरी से संबंधित फोटो शेयर करता हु जो की मैंने भगवन के दर्शन करते समय ली थी

jagannath parsad भगवान जगन्नाथ को चढ़ाया जाने वाला पवित्र भोजन ‘महाप्रसाद’ कहलाता है। यह एक दिव्य प्रसाद है जिसे रोज़ाना ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोई में तैयार किया जाता है। इसे अत्यंत पवित्र, आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली और भगवान की कृपा का साक्षात रूप माना जाता है।

श्री जगन्नाथ मंदिर (पुरी) की ध्वजा को ‘पतितपावन बाना’ कहा जाता है। इसे हर दिन शाम को एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला ऊंचे गुंबद पर चढ़कर बदलते हैं। इस ध्वजा का हवा की विपरीत दिशा में लहराना और इसके दर्शन मात्र से पापों से मुक्ति मिलना इसकी प्रमुख महिमा है।

चंदन सरोवर (जिसे आधिकारिक तौर पर नरेंद्र सरोवर या नरेंद्र पोखरी कहा जाता है) ओडिशा के पुरी में स्थित एक बेहद पवित्र और विशाल तालाब है। यह श्री जगन्नाथ मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है

भगवान जगन्नाथ के प्रतिनिधि स्वरूप (मदनमोहन) और पांच शिव लिंगों (पंच पांडव) को सुंदर नावों (चापों) में बैठाकर सरोवर की सैर कराई जाती है। यहाँ शाम के समय जाना सबसे अच्छा माना जाता है। चंदन यात्रा के दिनों में यहाँ की रौनक और रोशनी देखने लायक होती है।

पुरी बीच (Puri Beach) भारत के ओडिशा राज्य में बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित एक प्रसिद्ध और पवित्र समुद्र तट है。यह अपनी सुनहरी रेत और शानदार लहरों के लिए जाना जाता है。यहाँ पुरी आने वाले श्रद्धालु जगन्नाथ मंदिर के दर्शन के बाद समुद्र किनारे आराम करने और सूर्यास्त का आनंद लेने आते हैं

जगन्नाथ पुरी में स्थित हनुमान मंदिर को मुख्य रूप से बेड़ी हनुमान मंदिर (या दरिया महावीर) कहा जाता है। यह समुद्र तट (चक्रतीर्थ रोड) पर स्थित है। मान्यता है कि समुद्र की लहरों से पुरी की रक्षा के लिए भगवान जगन्नाथ ने हनुमान जी को यहाँ जंजीरों से बांधा था।

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